आखिर क्यों भगवान कृष्ण को रणछोड़ क्यों कहा जाता हैं ?

आखिर क्यों भगवान कृष्ण को रणछोड़ क्यों कहा जाता हैं ?

यह घटना तब की है जब मगध के शासक जरासंध ने कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा था परंतु उसने देखा कि कृष्ण अपने भाई बलराम के साथ रण यानि युद्ध का मैदान छोड़कर भाग रहे हैं। इस दृश्य को देखकर जरासंध हंसने लगा।
तब कृष्ण अपने भाई बलराम के साथ बहुत दूर तक भाग चुके थे, जिसके कारण दोनों को ही थकान महसूस होने लगी थी। आराम करने के लिए वे दोनों भाई प्रवर्शत पर्वत, जिसपर हमेशा वर्षा होती रहती थी, पर चढ़ गए। जरासंध ने उन दोनों को बहुत ढूंढ़ा लेकिन दोनों में से कोई भी उनके हाथ ना लगा। तब जरासंध ने अपने सैनिकों को यह आदेश दे दिया कि वे इस पर्वत को आग लगा दें।

भगवान कृष्ण ने जब यह देखा कि वह पर्वत जलने लगा है तो उन्होंने अपने भाई बलराम के साथ मिलकर उस 44 कोस ऊंचे पर्वत से छलांग लगा दी और जरासंध के सैनिकों की नजरों से बचते हुए समुद्र से घिरी द्वारका नगरी में जा पहुंचे। इसीके बाद कृष्ण ने द्वारका में अपना राज्य स्थापित किया। जरासंध को लगा कि कृष्ण और बलराम, उस आग में जलकर मर गए हैं। वह अपने आपको अत्यंत शक्तिशाली समझने लगा और इस घटना को उसने अपनी जीत मान लिया। वह इस बात को अपनी शान मानते हुए वापस मगध लौट गया।

अब यहां सबके मन में यही सवाल उठता है कि कृष्ण भगवान ने मैदान छोड़कर भागने के विकल्प को ही क्यों चुना? इसके पीछे भी उनकी एक कूटनीतिक चाल हैं। दरअसल भगवान कृष्ण यह जानते थे कि उस समय उनके शत्रु यानि जरासंध की ताकत उनसे कहीं ज्यादा थी। रणछोड़ कर वे यह संदेश देना चाह रहे थे कि दुश्मन का सामना तभी करना चाहिए जब आपको अपने बल पर पूरा यकीन हो। यूं ही स्वयं कुछ भी बिना सोचे-समझे शत्रु का सामना नहीं करने का संदेश देती है कृष्ण की यह चाल। अगर कृष्ण ऐसा न करते तो उनके साथ उनकी सेना को भी नुकसान पहुंचता, सैनिक भी बेमौत मारे जाते। तो कृष्ण ने स्वयं पर आक्षेप लेकर भी सेना का भला ही किया।

इस घटना से हमें भी यही संदेश मिलता है कि अगर हमें लगता है कि हमारी ताकत शत्रु से कम पड़ रही है तो जान जोखिम में डालने से बेहतर है कि हम वहां से भाग जाएं क्योंकि अगर जान बची रही तो आगे भी कई अवसर आएंगे। जब हम पूरी ताकत के साथ शत्रु का सामना करके उसे हरा भी सकते हैं।