आखिर क्यों लेना पड़ा था भगवान विष्णु को मस्त्य अवतार और लानी पड़ी थी जल प्रलय

आखिर क्यों लेना पड़ा था भगवान विष्णु को मस्त्य अवतार और लानी पड़ी थी जल प्रलय

हिन्दू पुराणों अनुसार एक समय ऐसा आया था जबकि धरती पर भयानक वर्षा हुई थी जिसके चलते संपूर्ण धरती जल में डूब गई थी, लेकिन सिर्फ कैलाश पर्वत की चोटी और ओंमकारेश्वर स्थित मार्केण्डेय ऋषि का आश्रम ही नहीं डूब पाया था। तौरात, इंजिल, बाइबिल और कुरआन और मत्स्य पुराण सहित जल प्रलय की यह कथा सभी देश की सभ्यताओं के स्मृतिलेखों में दर्ज है। आओ जानते हैं जल प्रलय की कथा और तथ्य।

द्रविड़ देश के राजर्षि सत्यव्रत ने देखा कि एक मछली जल से बाहर तड़फ रही है उन्होंने उसे अपने जल के पात्र में डाल दिया। कुछ देर बाद उक्त मछली का आकार बड़ा हो गया तो उन्होंने उसे उस पात्र से निकाल बड़े पात्र में छोड़ दिया, लेकिन उस मछली का आकार और बढ़ता गया तो उन्होंने उसे अपने महल के सबसे बड़े पात्र में छोड़ दिया, लेकिन मछली का आकार दुगनी गति से बढ़ने लगा। यह देखकर राजा मछली के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हो गए और उन्होंने कहा- आप मुझे कोई चमत्कारिक या मायावी मछली जान पड़ती हैं आप ही बताएं की आप कौन हैं।

तब राजर्षि सत्यव्रत के समक्ष भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में प्रकट होकर कहा कि हे राजन! आज से सातवें दिन भूमि जल प्रलय से समुद्र में डूब जाएगी। तब तक तुम एक नौका बनवा लो और समस्‍त प्राणियों के सूक्ष्‍म शरीर तथा सब प्रकार के बीज लेकर सप्‍तर्षियों के साथ उस नौका पर चढ़ जाना। प्रचंड आंधी के कारण जब नाव डगमगाने लगेगी तब मैं मत्स्य रूप में तुम सबको बचाऊंगा।

तुम लोग नाव को मेरे सींग से बांध देना। तब प्रलय के अंत तक मैं तुम्‍हारी नाव खींचता रहूंगा। उस समय भगवान मत्स्य ने नौका को हिमालय की चोटी से बांध दिया। उसे चोटी को ‘नौकाबंध’ कहा जाता है। भगवान ने प्रलय समाप्‍त होने पर राजा सत्यव्रत को वेद का ज्ञान वापस दिया। राजा सत्‍यव्रत ज्ञान-विज्ञान से युक्‍त हो वैवस्‍वत मनु कहलाए। उक्त नौका में जो बच गए थे उन्हीं से संसार में जीवन चला।