आखिर किस व्यक्ति ने भगवान गणेश के दांत तोड़ दिए थे?

आखिर किस व्यक्ति ने भगवान गणेश के दांत तोड़ दिए थे?

भृगुवंशी जमदग्नि ऋषि और रेणुका के पुत्र परशुराम ने जब पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दिया, तब वे अपने गुरुदेव भगवान भूतनाथ शिव के चरणों में प्रणाम करने और गुरुपत्नी अम्बा पार्वती तथा दोनों गुरुपुत्रों–कार्तिकेय तथा गणेश को देखने की लालसा से कैलास पहुँचे। कैलाशपुरी का भ्रमण करके उन्होंने गजमुख गणेश से कहा–’मैं अपने गुरु शूलपाणि शिव का दर्शन करना चाहता हूँ।’

उस समय भगवान शंकर जगदम्बा पार्वती के साथ अंतपुर में शयन कर रहे थे। जब रेणुकानन्दन परशुराम शंकरजी को प्रणाम करने के लिए अंत:पुर में जाने लगे तब गणपतिजी ने उन्हें समझाया कि इस समय वे अंदर न जाएं पर परशुरामजी अपनी हठ पर अड़े रहे और उन्होंने अनेकों युक्तियों से उस समय अपना अंदर जाना निर्दोष बतलाया पर बुद्धिविशारद गणेश ने उनको अंदर जाने से रोक दिया।

इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित करने वाले रेणुकानन्दन परशुराम कुपित हो गए और श्रीगणेश और परशुरामजी–दोनों में केवल वाग्युद्ध ही नहीं, मल्लयुद्ध भी होने लगा। तब परशुरामजी ने फरसा उठा लिया। उमापुत्र गणेश ने अपनी सूंड को लम्बा कर परशुरामजी को उसमें लपेट लिया और चारों तरफ घुमाते हुए उन्हें समस्त लोकों के दर्शन करा दिए।

भृगुनन्दन परशुराम ने अपने इष्ट भगवान श्रीकृष्ण और गुरु शंकर द्वारा प्रदत्त स्तोत्र व कवच का स्मरण कर अपने अमोघ फरसे को गौरीनन्दन श्रीगणेश पर चला दिया। शिव की शक्ति के प्रभाव से वह परशु गणेश के बांये दांत को काटकर पुन: रेणुकानन्दन परशुराम के हाथ में लौट आया।

बुद्धिविनायक गणेश का दांत टूटकर भयंकर शब्द करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। रक्त से सना दांत देखकर स्कन्द, वीरभद्र व सभी गण कांप उठे। उस भयंकर ध्वनि को सुनकर भगवान शिव व पार्वती की निद्रा भंग हो गई और वे अंत:पुर से बाहर आए। उन्होंने श्रीगणेश का मुख रक्त से सराबोर देखा। स्कन्दकुमार द्वारा सारा वृतान्त सुनाए जाने पर सती पार्वती को क्रोध आ गया। उन्होंने परशुरामजी से कहा–’तुमने करुणासागर गुरु और अमोघ फरसा पाकर पहले क्षत्रिय-जाति पर परीक्षा की, अब गुरु-पुत्र पर परीक्षा की है। कहां तो वेदों में ‘गुरु को दक्षिणा देना’ कहा है और तुमने तो गुरुपुत्र के दांत को ही तोड़ डाला। श्रीकृष्ण के अंश से उत्पन्न हुआ यह गणेश तेज में श्रीकृष्ण के ही समान है। अन्य देवता श्रीकृष्ण की कलाएं हैं। इसीसे इनकी अग्रपूजा होती है। जितेन्द्रिय पुरुषों में श्रेष्ठ गणेश तुम्हारे जैसे लाखों को मारने की शक्ति रखता है; परन्तु वह मक्खी पर भी हाथ नहीं उठाता।’

ऐसा कहकर पार्वतीजी क्रोधवश परशुरामजी को मारने के लिए उद्यत हो गयीं। तब परशुरामजी ने अपने गुरु शिव को प्रणामकर इष्टदेव श्रीकृष्ण का स्मरण किया। तभी वहां भगवान विष्णु वामन रूप से प्रकट हो गये और पार्वतीजी को समझाते हुए बोले–’तुम जगज्जननी हो। तुम्हारे लिए जैसे गणेश और कार्तिकेय हैं, वैसे ही भृगुवंशी परशुराम भी पुत्र के समान हैं। इनके प्रति तुम्हारे और शंकरजी के मन में भेदभाव नहीं है। पुत्र के साथ पुत्र का विवाद तो दैवदोष से घटित हुआ है। दैव को मिटाने में कौन समर्थ हो सकता है? तुम्हारे पुत्र का ‘एकदन्त’ नाम वेदों में विख्यात है। सामवेद में कहे हुए तुम्हारे पुत्र के नामाष्टक स्तोत्र को मैं बताता हूँ।’

इस प्रकार पार्वतीजी को समझा-बुझाकर भगवान विष्णु ने परशुराम से कहा–’तुम सचमुच अपराधी हो, तुमने क्रोधवश शिवपुत्र गणेश का दांत तोड़कर अपराध किया है। अत: मेरे द्वारा बतलाये गए स्तोत्र से गणपति का स्तवन करो।’

भृगुनन्दन परशुराम ने गौरी का स्तवन करते हुए कहा–’जगज्जननी! रक्षा करो! मेरे अपराध को क्षमा करो। भला, कहीं, बच्चे के अपराध से माता कुपित होती है।’ पार्वतीजी द्वारा परशुरामजी को क्षमा करने पर उन्होंने श्रीगणेश का स्तवन-पूजन किया। इस प्रकार गणेशजी ‘एकदन्त’ कहलाए।