जाने उस कथा को जब हनुमान जी ने अपनी बुद्धि से ढूंढा रावण को मारने वाला बाण

जाने उस कथा को जब हनुमान जी ने अपनी बुद्धि से ढूंढा रावण को मारने वाला बाण

हम अक्सर सुनते हैं कि श्री राम ने रावण का वध उसकी नाभि में तीर मार कर किया था ।लेकिन देखा जाए तो हमने कई बार पढ़ा होगा कि युद्ध के दौरान एक नैतिक नियम होता था कि नाभी के नीचे प्रहार नहीं किया जाए तो फिर रावण वध कैसे संभव हुआ?  इसके पीछे हनुमान जी की अपार बुद्धि ही थी। आइए इस कहानी को पढ़ते हैं:

श्री राम और रावण के बीच भयंकर युद्ध हो रहा था। श्री राम रावण का शीश काटते , लेकिन उसका दूसरा शीश प्रकट हो जाता। तब हनुमान जी ने परेशान होकर विभीषण जी से पूछा कि रावण की मृत्यु क्यों नहीं हो रही? यह सुनकर विभीषण जी ने जवाब दिया :क्योंकि “जिस तीर से रावण की मृत्यु हो सकती है वह तीर श्री राम के तरकश में है ही नहीं। ”हनुमान जी बोले, तो विभीषण जी! फिर वह तीर कहां है?

विभीषण ने बताया, “ ब्रह्मा जी ने रावण को किसी भी देवता से ना मारे जाने का वरदान दिया था। लेकिन किसी मनुष्य द्वारा मारे जाने की कल्पना रावण के दिमाग में थी। इसलिए उसने यमलोक पर आक्रमण कर दिया और यमराज को बंदी बना लिया और मृत्यु बाण उनसे छीन लिया। वह मृत्यु बाण रावण ने कहीं छुपा दिया है। उसका पता कोई भी नहीं जानता। ”

विभीषण की बात सुनकर हनुमान जी लंका में गए और हर जगह मृत्यु बाण को ढूंढ मारा। लेकिन उन्हें बाण कहीं नहीं मिला। फिर हनुमान जी ने सोचा कि मैं यमराज के पास जाता हूं। उन्होंने यमराज से कहा कि वह युद्ध भूमि में जाएं और रावण को अपने दर्शन दें, जिससे रावण को ऐसे लगेगा कि उसकी मृत्यु नजदीक आ गई है। क्योंकि यमराज के दर्शन तो मृत्यु के समय ही होते हैं। क्योंकि उसकी मृत्यु उस मृत्यु बाण से ही होगी तो वह अपने बाण को ढूंढने और उसे सुरक्षित जगह पर पहुंचाने का काम अवश्य करेगा। फिर ऐसा ही हुआ यमराज को युद्ध भूमि में अपने सामने देखकर रावण घबरा गया। उसे अपने मृत्यु बाण का ख्याल आया और आसुरी माया से उसने अपने दो शरीर बनाए। एक शरीर से वह श्री राम से युद्ध भूमि में युद्ध कर रहा था और दूसरे शरीर के साथ उसने लंका में प्रवेश किया लेकिन हनुमान जी की दृष्टि से उसका वह मायावी शरीर ना बचा।

हनुमान जी ने देखा कि रावण लंका में स्थित एक मायावी गुफा में प्रविष्ट हुआ और वहां पर जाकर उसने अपनी मृत्यु बाण को देखा और उसे सुरक्षित देखकर खुशी खुशी युद्ध भूमि की ओर चला गया। हनुमान जी अभी वहीं खड़े थे कि वहां यमराज ने प्रवेश किया और यमराज ने हनुमान जी को वह मृत्यु बाण चुराने के लिए कहा जो कि बिल्कुल न्यायोचित था। यमराज जी ने कहा कि यह बाण मुझसे बलपूर्वक छीना गया है और पृथ्वी पर शक्ति का संतुलन बनाने के लिए आपको इस बाण को श्री राम को दे आना चाहिए। यह बाण आपको श्री राम के तरकश में चुपके से रखना है। यमराज ने यह भी बताया कि इसी मृत्यु बाण के द्वारा रावण की नाभि में रखा हुआ अमृत सूखेगा। अब श्री राम कभी भी रावण की नाभि पर प्रहार नहीं करेंगे इसलिए आपको उस बाण की दिशा भी बदलनी पड़ेगी। इस प्रकार जब श्री राम - रावण युद्ध में श्री राम ने अपने तरकश में से वह मृत्यु बाण छोड़ा तो हनुमान जी ने उसकी बिना बाण को छुए उसकी दिशा बदल दी। जिससे रावण की नाभि में रखा हुआ अमृत सूख गया और उसकी मृत्यु हो हो पाई।