जानिए हनुमान जी ने कब और कितनी बार लगाई थी छलांग

जानिए हनुमान जी ने कब और कितनी बार लगाई थी छलांग

हिन्दू धर्म में कई देवता शक्ति से आसमान में आते-जाते थे और वो आकाश में विचरण में सिर्फ अपने वाहन से आते थे. लेकिन सिर्फ हनुमान जी , नारद मुनि और सनत कुमार ही ऐसे देवता थे जो अपनी शक्तियों से आकाश में कहीं भी आए जा सकते थे. हनुमान सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हैं। ऐसा माना जाता है कि हनुमान जी ने अपने पूरे जीवन काल में केवल पांच बार छलांग लगाई थी, आइये जानते है कब - कब हनुमान जी ने छलांग लगाई। 

1. पहली छलांग : हनुमानजी ने अपनी यह पहली छल्लांग अपने बचपन में लगाई थी। एक बार की बात है, माता अंजनि हनुमानजी को कुटिया में सुलाकर कहीं बाहर चली गई थीं। थोड़ी देर में जब हनुमानजी की नींद खुली तो उन्हें तेज भूख लगने लगी। इतने में आकाश में उन्हें चमकते हुए भगवान सूर्य दिखाई दिए। हनुमानजी से समझा कि यह कोई लाल-लाल मीठा फल है। बस उसे तोड़ने के लिए हनुमानजी उसकी ओर उड़ने लगे। हनुमानजी ने सूर्य भगवान के निकट पहुंचकर उन्हें पकड़कर अपने मुंह में रख लिया। उसके बाद तो जगत में हाहाकार मच गया। आगे की कथा तो आपको पता ही है।

2.दूसरी छलांग:  सबसे पहले बाली पुत्र अंगद को समुद्र लांघकर लंका जाने के लिए कहा गया लेकिन अंगद ने कहा कि मैं चला तो जाऊंगा लेकिन पुन: लौटने की मुझमें क्षमता नहीं है। मैं लौटने का वचन नहीं दे सकता। तब जामवंत के याद दिलाने पर हनुमानजी को अपनी शक्ति का भान हुआ तो वे दो छलांग में समुद्र को पार कर गए। वहां जाकर उन्होंने सबसे पहले माता सीता को राम की अंगुठी थी। फिर राक्षसों का वध करने के बाद मेघनाद के पुत्र अक्षयकुमार का भी वध कर दिया और फिर रावण के उकसावे पर लंका दहन कर वापस लौट आए।

3.तीसरी छलांग : राम-रावण युद्ध के दौरान जब रावण के पुत्र मेघनाद ने शक्तिबाण का प्रयोग किया तो लक्ष्मण सहित कई वानर मूर्छित हो गए थे। जामवंत के कहने पर हनुमानजी संजीवनी बूटी लेने द्रोणाचल पर्वत की ओर गए। जब उनको बूटी की पहचान नहीं हुई, तब उन्होंने पर्वत के एक भाग को उठाया और वापस लौटने लगे। रास्ते में उनको कालनेमि राक्षस ने रोक लिया और युद्ध के लिए ललकारने लगा। कालनेमि राक्षस रावण का अनुचर था। रावण के कहने पर ही कालनेमि हनुमानजी का रास्ता रोकने गया था। लेकिन रामभक्त हनुमान उसके छल को जान गए और उन्होंने तत्काल उसका वध कर दिया।

4.चौथीछलांग: अहिरावण रावण का मित्र था। अहिरावण पाताल में रहता था। रावण ने कहने पर उसने भगवान राम के युद्ध शिविर में उतरकर राम और लक्ष्मण दोनों का अपहरण कर लिया था। दोनों को वह पाताल लोक लेकर गया और वहां उसने दोनों को बंधक बनाकर रख लिया। उनके अपहरण से वानर सेना भयभीत व शोकाकुल हो गई, लेकिन विभीषण ने यह भेद हनुमान के समक्ष प्रकट कर दिया कि कौन अपहरण करके ले जा सकता है।

तब हनुमानजी राम-लक्षमण को अपहरण से छुड़वाने के लिए पाताल पुरी पहुंच गए। वहां उन्होंने देखा कि उनके ही रूप जैसा कोई बालक पहरा दे रहा है। उसका नाम मकरध्वज था। मकरध्वज हनुमानजी का ही पुत्र था। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और मकरध्वज को पाताल लोक का राजा नियुक्त करते हुए उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। वे राम-लक्षमण दोनों को अपने कंधे पर बिठाकर पुन: युद्ध शिविर में लौट गए।

5.पांचवीं छलांग : इस छल्लांग में हनुमानजी लंका से सीधे अयोध्या पहुंच गए और वहां वे भगवान राम के राज्याभिषेक में शामिल हुए थे और वहीं पर वे राम की सेवा के लिए नियुक्त हो गए।