जानिए क्या है वैष्णों देवी की कहानी

जानिए क्या है वैष्णों देवी की कहानी

हिन्दू धर्म में वैष्णों देवी के दर्शन करना बहुत ही शुभ और पवित्र माना गया हैं और वैष्णों देवी के दर्शन करने मात्र से सारी मनोकामना पूरी हो जाती हैं. लेकिन किसी को इसके पीछे की कहानी नहीं जानते है. आइये जानते है इसके पीछे की क्या कहानी है. 

कटरा से कुछ दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह हर समय प्रभु भक्ति में लीन रहते थे। निर्धन होने के बावजूद उनके मन में किसी तरह का लालच नहीं था। वह हर समय लोगों की सेवा में लगे रहते और प्रभु की भक्ति में लीन रहते। गांव वाले भी उनका बहुत ही अादर करते थे। उनका एक दुख था कि वे नि:संतान थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुंवारी कन्याओं को बुलवाया। मां उनकी भक्ति से बहुत ही प्रभावित थीं।

मां वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गईं, पर मां वैष्णो देवी वहीं रहीं। मां ने श्रीधर से कहा कि वह गांववालों को जाकर कहे कि उसके घर भंडारे में आए। श्रीधर कन्या के बचन सुन कर हुआ। वह जानता था कि उसके घर में खाने का कोई सामान नहीं है पर फिर भी वह लोगों को कैसे बुलाए। फिर भी उसने दिव्य कन्या की बात को नहीं टाला। हैरान व परेशान होने के बावजूद उसने दिव्य कन्या की बात मान ली और आस-पास के गांवों में भंडारे का संदेश पहुंचा दिया। वहां से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दे दिया।

गांववाले श्रीधर की स्थिति से अच्छी तरह से परिचित थे कि पंडित जी तो बहुत ही गरीब हैं वे अकेले कैसे गांववासियों को भरपेट खाना खिलाएंगे। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित भी थे कि वह कौन सी कन्या है, जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए जमा हुए। तब कन्या रूपी मां वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया। इस पात्र में भोजन कभी खत्म नहीं होता था। भोजन परोसते हुए वह कन्या भैरवनाथ के पास भी गई। भैरव नाथजी अड़ गए कि मैं तो खीर व पूरी नहीं खाऊंगा। मैं तो मांस व मदिरा ही लूंगा। मां ने उन्हें समझाया कि मांस मदिरा भंडारे में निषेध है इसलिए उन्हें ये सब नहीं मिल सकता। भंडारा केवल शाखाहार ही है।

भैरवनाथ जी भी अपनी लीला दिखाने आए थे इसलिए वह अपनी बातपर अड़े रहे। मां ने जब भैरवनाथ की बात नहीं मानी तो वह मां को पकडने के लिए उनके पीछे भागा। मां ने उसी समय वायु का रूप धारण कर लिया और त्रिकूटा पर्वत की ओर उड़ चली। भैरव भी वायु की गति से उनके पीछे उड़ने लगा। उधर मां के साथ लंगरवीर पवनपुत्र मां पवनपुत्र हनुमान भी थे। रास्ते में हनुमानजी को प्यास लगी तो माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है. इसके पवित्र जल को पीने या इसमें स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं।

इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर गई और वहां 9 माह तक घोर तपस्या की। भैरव नाथ उनके पीछे-पीछे यहां तक आ पहुंचा था। वहां एक साधु ने भैरवनाथ को समझाया कि जिसके पीछे तू पड़ा है वह मां जगदम्बा मां भगवती है। वह तुम्हारा संहार कर देगी। भैरव को पता था कि केवल मां ही उसे मोक्ष दिला सकती है। माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं।यह गुफा आज भी अर्द्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है.