आखिर क्या है खाटू शयाम जी की कथा ? जाने

आखिर क्या है खाटू शयाम जी की कथा ? जाने

युद्ध की तैयारियां चल रही थी,तब कृष्ण से सभी योद्धाओं से ये सवाल पूछा कि “तुम इस दिन को कितने दिनों में खत्म कर सकते हो?” भीम ने कहा २० दिन, कर्ण ने कहा २४ दिन , अर्जुन ने कहा २८ दिन ,इस तरह सभी ने जवाब दिया। जब बारबरिक से कृष्ण ने ये सवाल पूछा तो उसने जवाब दिया कि वो एक क्षण में इसे खत्म कर सकता है। कृष्ण अचंभित हुए और कहा- ऐसा क्या खास है तुम में जो ऐसा कह रहे हो? तब बारबरिक ने उसे उन तीन तीरों के बारे में कृष्ण को बताया। तो कृष्ण ने कहा - हमें भी दिखाओ अपनी निपुणता और शक्ति को? तब कृष्ण ने उसे पास के एक पीपल के पेड़ को दिखाकर कहा कि ‘इस वृक्ष के प्रत्येक पत्ते को छेद के बताओ अपने तीर से’ बारबरिक ने चुनौती स्वीकार की और आँखे बंद कर ध्यान लगाने लगा तभी कृष्ण ने एक पत्ती तोड़ कर अपने पैर के तले दबा ली । जब बारबरिक ने तीर चलाया तो उसने सारे पत्तियाँ छेद दी और तीर ने “अंतिम पत्ती को भी कृष्ण के पैर को चीर कर छेद दिया” जो आगे जाकर कृष्ण की मौत का कारण भी बना क्योंकि इस की वजह से उनके शरीर का वो हिस्सा कमजोर हो गया था। कृष्ण को ऋषि दुर्वासा का वर था कि सिवाय पैर को छोड उनका सारा शरीर किसी भी अस्त शस्त्र से अभेद्य है। बाद में उसी कमजोर जगह शिकारी के गलती से लगे तीर की वजह से कृष्ण की मृत्यु हो गई।

जब कृष्ण ने बारबरिक से पूछा कि वो युद्ध में किसका साथ देगा ,तो उसने अपनी माँ को दिये वचन के बारे में बताया ,तो कृष्ण वह सुन चिन्ता में पड गये कि ऐसे तो हम युद्धहार जायेंगे। तब कृष्ण ने कुछ सोचा और बारबरिक से कहा कि “क्या मैं तुमसे कुछ माँगूँ तो मुझे दोगे?” बारबरिक जानता था वो अवतार हैं,वो उन की बात को कैसे टाल सकता था। तो उसने कृष्ण को वचन दिया। तब कृष्ण ने कहा कि मुझे एक योद्धा का सिर काटकर लाकर दो! तब बारबरिक ने कहा -बिल्कुल,आप आदेश करें। तब कृष्ण अंदर से एक सीसा लाये और उसे दिखाया। बारबरिक सारा खेल समझ गया ,लेकिन उसने कृष्ण से कहा कि वो ऐसा करेगा ,लेकिन वह यह युद्ध देखने के लिये आया है और वह इस महान युद्ध का साक्षी बनना चाहता है,तब कृष्ण ने उसे वर दिया कि वो अपना सिर कटने के बाद भी युद्ध देख पायेगा । उसने उसी वक्त अपना सिर काट कर कृष्ण को दे दिया ,तब कृष्ण ने उसके सिर को एक पहाड़ी पर रखा ,जहाँ से उसने सारा युद्ध देखा।

उसी बारबरिक को राजस्थान मे “खाटूश्यामजी” और हरियणा में बलियाबाबा के नाम से पूजा जाता है। एक किंवदंती भी है,जो कहती है कि वो दक्षिण से आया था।