आखिर क्या है भगवान शिव को समर्पित सिद्धाश्रम का रहस्य ? जाने

आखिर क्या है भगवान शिव को समर्पित सिद्धाश्रम का रहस्य ? जाने

सिद्धाश्रम अथवा ज्ञानगंज साधारण भौगोलिक स्थान नहीं है यद्यपि यह गुप्त रूप से भूपृष्ठ पर विद्यमान है तथापि इसका वास्तविक स्वरूप काफी दूर है। भौम (भूमि संबंधी) सिद्धाश्रम कैलाश के आगे ऊर्ध्व में स्थित है। फिर भी यह साधारण पर्यटकों की गतिविधि से अतीत है। यह सिद्ध स्थान तिब्बतियों गुप्त योगियों की भाषा में "ज्ञानगंज" के नाम से प्रसिद्ध है।

अनादिकाल से हिमालय का संपूर्ण क्षेत्र भारतीय संतों के लिए तपोभूमि रहा है। प्राचीनकाल के ऋषि-मुनि से लेकर आधुनिक काल के अनेक संत योगी हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में तपस्या करते रहे, सिद्ध पुरुष जिस स्थान पर बैठकर योग साधना करते हैं वह स्थान सिद्धभूमि बन जाता है।

सिद्धभूमि सिद्ध पुरुष के नाम के अनुसार अथवा अन्य किसी प्रकार के नियम के अधीन विभिन्न नाम और रूप लेकर श्री भगवान की विश्व लीला में अपना अपना काम करती है। जो महापुरुष सिद्धि प्राप्त कर अधिकारिक अवस्था लाभ करते हैं वही इन सभी सिद्धियों के अधिष्ठाता होते हैं।

जिनमें अधिकार वासना नहीं है वह सिद्धभूमि में रहते हुए भी ना रहने के समान है अथवा वह सिद्धभूमि के ऊर्ध्व में रहते हैं। जिस प्रकार सिद्ध पुरुष, चित्त और अचित्त, कार्य और कारण, शुद्ध और अशुद्ध एवं स्थूल और सूक्ष्म सभी अवस्था में अवयाहत रहते हैं तथा अपने वैशिष्टय का संरक्षण कर सकते हैं, उसी प्रकार यह बातें सिद्धभूमि पर भी लागू होती हैं। देह सिद्ध करने के पश्चात भूमि को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि देह सिद्धि होने पर उसी प्रकार भूमि-सिद्धि हो जाती है। इससे स्पष्ट है कि सिद्ध आत्मा की इच्छानुसार तथाकथित सिद्धभूमि का आविर्भाव होता है।

कहा जाता है कि सिद्धाश्रम हमारी इस परिचित पृथ्वी पर एक विशेष गुप्त स्थान है। किन्तु वह इतना गुप्त है कि विशिष्ट शक्ति के विकास ना होने से तथा उस स्थान के अधिष्ठाता की आज्ञा ना होने से मृत्युलोक के जीव को दिखाई नहीं देता।

प्रत्येक सिद्ध भूमि की यही विशेषता है। परमार्थिक सिद्धाश्रम का पता जानना सभी के लिए संभव नहीं है पर कुछ लोगों को जरूर सिद्धाश्रम का पता चल गया है ऐसा सुनने में आता है पर वह व्यवहारिक सिद्धाश्रम से संश्लिष्ट समझना चाहिए।।

सिद्धाश्रम की भी यही विशेषता है कि वह सदा और सर्वत्र ही अपने रूप में स्थित रहती है। वह जागतिक विचार से लौकिक प्रतीत होने पर भी वास्तव में अत्यंत अलौकिक है। वह अखंड और अविभाज्य है। उसके अंश नहीं होते एवं सिद्ध पुरुष की इच्छानुसार अंशरूप में प्रतीत होने पर पर भी वह समग्र अखंड ही रहती है। यदि उस भूमि के अधिष्ठाता पुरुष किसी को आकृष्ट करने की इच्छा करें अथवा दर्शन देने के लिए उत्सुक हो तो लौकिक जगत में जिस किसी स्थान से वह प्राप्त हो जाती है। अंत में वह स्थूल नहीं है, सूक्ष्म भी नहीं है जबकि एकसाथ ही स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही हैं।।