हिन्दू धर्म में क्या है आश्रम व्यवस्था ? आइये जानते है

हिन्दू धर्म में क्या है आश्रम व्यवस्था ? आइये जानते है

हिन्दू धर्म में मनुष्य के जीवन को आश्रम व्यवस्था के तहत चार हिस्से में बांटा गया हैं. आइये जानते है, पहला विद्यार्थी जीवन, दूसरा दांपत्य या गृहस्थ जीवन, तीसरा शिक्षात्मक या आचार्य का जीवन और चौथा संन्यासी का जीवन। उक्त चार को नाम दिया गया ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।

चारों से चार पुरुषार्थ को साधा जाता है। ये चार पुरुषार्थ है- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म से मोक्ष और अर्थ से काम साध्‍य माना गया है। ब्रह्मचर्य और गृहस्थ जीवन में धर्म, अर्थ और काम का महत्व है। वानप्रस्थ और संन्यास में धर्म प्रचार तथा मोक्ष का महत्व माना गया है।

प्राचीन भारत में ऋषि-मुनि वन में कुटी बनाकर रहते थे। जहां वे ध्यान और तपस्या करते थे। उक्त जगह पर समाज के लोग अपने बालकों को वेदाध्यन के अलावा अन्य विद्याएं सीखने के लिए भेजते थे। धीरे-धीरे यह आश्रम संन्यासियों, त्यागियों, विरक्तों धार्मिक यात्रियों और अन्य लोगों के लिए शरण स्थली बनता गया।

यहीं पर तर्क-वितर्क और दर्शन की अनेकों धारणाएं विकसित हुई। सत्य की खोज, राज्य के मसले और अन्य समस्याओं के समाधान का यह प्रमुख केंद्र बन गया। कुछ लोग यहाँ सांसारिक झंझटों से बचकर शांतिपूर्वक रहकर गुरु की वाणी सुनते थे। इसे ही ब्रह्मचर्य और संन्यास आश्रम कहा जाने लगा।

ब्रह्मचर्य आश्रम को ही मठ या गुरुकुल कहा जाता है। ये आधुनिक शिक्षा के साथ धार्मिक शिक्षा के केंद्र होते हैं। यह आश्रय स्थली भी है। पुष्‍ट शरीर, बलिष्ठ मन, संस्कृत बुद्धि एवं प्रबुद्ध प्रज्ञा लेकर ही विद्यार्थी ग्रहस्थ जीवन में प्रवेश करता है। विवाह कर वह सामाजिक कर्तव्य निभाता है। संतानोत्पत्ति कर पितृऋण चुकता करता है। यही पितृ यज्ञ भी है।

ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम में रहकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की शिक्षा लेते हुए व्यक्ति को 50 वर्ष की उम्र के बाद वानप्रस्थ आश्रम में रहकर धर्म और ध्यान का कार्य करते हुए मोक्ष की अभिलाषा रखना चाहिए अर्थात उसे मुमुक्ष हो जाना चाहिए। ऐसा वैदज्ञ कहते हैं।