जाने  पकिस्तांन के सबसे प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर की कथा और उसके बारे में

जाने पकिस्तांन के सबसे प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर की कथा और उसके बारे में

अगर  अपनी पडोसी देश पाकिस्तान की बात करें तो वहां शायद ही कोई मंदिर अब बचा हो, क्योकि वहां के अधिकांशः मंदिर या तो तोड़ दिए गए या उनकी हालत बहुत खराब हैं. आज हम आपको ऐसे ही एक मंदिर के बारे में बता रहे है  पाकिस्तान में हिन्दुओं का सबसे बड़ा मंदिर है और जो सबसे ज्यादा फेमस हैं. इस मंदिर का नाम है हिंगलाज देवी का हिंगलाज माता का मंदिर। पाकिस्तान के बलूचिस्तान के लासबेला जिले के मकरान तट पर एक शहर हिंगलाज में एक हिंदू मंदिर है, और हिंगोल नेशनल पार्क के बीच है। यह हिंदू देवी सती की शक्ति पीठों में से एक है। यह हिंगोल नदी के किनारे पहाड़ी गुफा में दुर्गा या देवी का एक रूप है। पिछले तीन दशकों में इस जगह ने लोकप्रियता बढ़ाई है और पाकिस्तान के कई हिंदू समुदायों के संदर्भ का एक एकीकृत बिंदु बन गया है।

हिंगलाज माता का गुफा मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में लारी तहसील के पहाड़ी इलाके में एक संकीर्ण घाटी में है। यह कराची के उत्तर-पश्चिम में 250 किलोमीटर (160 मील), अरब सागर से 12 मील (1 9 किमी) अंतर्देशीय और सिंधु के मुंह के पश्चिम में 80 मील (130 किमी) पश्चिम में है। यह हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर, मकरान रेगिस्तान खिंचाव में खेरथार पहाड़ियों की एक श्रृंखला के अंत में है। यह क्षेत्र हिंगोल नेशनल पार्क के अधीन है।
 
यह मंदिर भी एक शक्तिपीठ हैं. जो कि बलूचिस्तान में स्थित हैं. इस मंदिर की सबसे बड़ी बात ये है कि इस शक्तिपीठ की देखरेख मुस्लिम करते हैं और वे इसे चमत्कारिक स्थान मानते हैं। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह मंदिर 2000 वर्ष पूर्व पुराना हैं. इस शक्तिपीठ में प्रतिरूप देवी की प्राचीन दर्शनीय प्रतिमा विराजमान हैं। इस मंदिर की ख्याति सिर्फ कराची और पाकिस्तान ही नहीं अपितु पूरे भारत में है। नवरात्रों के समय यहाँ पर पूरे नौ दिन तक शक्ति की उपासना का विशेष आयोजन होता है। सिंध-कराची के लाखों सिंधी हिन्दू श्रद्धालु यहां माता के दर्शन को आते हैं। भारत से भी प्रतिवर्ष एक दल यहां दर्शन के लिए जाता है।
 
इस मंदिर पर गहरी आस्था रखने वाले लोगों का कहना है कि हिन्दू चाहे चारों धाम की यात्रा क्यों ना कर ले, काशी के पानी में स्नान क्यों ना कर ले, अयोध्या के मंदिर में पूजा-पाठ क्यों ना कर लें, लेकिन अगर वह हिंगलाज देवी के दर्शन नहीं करता तो यह सब व्यर्थ हो जाता है। वे स्त्रियां जो इस स्थान का दर्शन कर लेती हैं उन्हें हाजियानी कहते हैं। उन्हें हर धार्मिक स्थान पर सम्मान के साथ देखा जाता है।

ऐसा माना जाता है कि एक बार यहां माता ने प्रकट होकर वरदान दिया कि जो भक्त मेरा चुल चलेगा उसकी हर मनोकामना पूरी होगी। चुल एक प्रकार का अंगारों का बाड़ा होता है जिसे मंदिर के बाहर 10 फिट लंबा बनाया जाता है और उसे धधकते हुए अंगारों से भरा जाता है जिस पर मन्नतधारी चल कर मंदिर में पहुचते हैं और ये माता का चमत्कार ही है की मन्नतधारी को जरा सी पीड़ा नहीं होती है और ना ही शरीर को किसी प्रकार का नुकसान होता है, लेकीन आपकी मन्नत जरूर पुरी होती है। हालांकि आजकल यह परंपरा नहीं रही।
 
पौराणिक कथानुसार जब भगवान शंकर माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर तांडव नृत्य करने लगे, तो ब्रह्माण्ड को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के मृत शरीर को 51 भागों में काट दिया। मान्यतानुसार हिंगलाज ही वह जगह है जहां माता का सिर गिरा था। इस मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता व्याप्त है। कहा जाता है कि हर रात इस स्थान पर सभी शक्तियां एकत्रित होकर रास रचाती हैं और दिन निकलते हिंगलाज माता के भीतर समा जाती हैं।

यहां का मंदिर गुफा मंदिर है। ऊंची पहाड़ी पर बनी एक गुफा में माता का विग्रह रूप विराजमान है। पहाड़ की गुफा में माता हिंगलाज देवी का मंदिर है जिसका कोई दरवाजा नहीं। मंदिर की परिक्रमा यात्री गुफा के एक रास्ते से दाखिल होकर दूसरी ओर निकल जाते हैं। मंदिर के साथ ही गुरु गोरखनाथ का चश्मा है। मान्यता है कि माता हिंगलाज देवी यहां सुबह स्नान करने आती हैं।
 
यहां माता सती कोटटरी रूप में जबकि भगवान भोलेनाथ भीमलोचन भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। माता हिंगलाज मंदिर परिसर में श्रीगणेश, कालिका माता की प्रतिमा के अलावा ब्रह्मकुंड और तीरकुंड आदि प्रसिद्ध तीर्थ हैं। इस आदि शक्ति की पूजा हिंदुओं द्वारा तो की ही जाती है इन्हें मुसलमान भी काफी सम्मान देते हैं। हिंगलाज मंदिर में दाखिल होने के लिए पत्थर की सीढिय़ां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर में सबसे पहले श्री गणेश के दर्शन होते हैं जो सिद्धि देते हैं। सामने की ओर माता हिंगलाज देवी की प्रतिमा है जो साक्षात माता वैष्णो देवी का रूप हैं।