आखिर पंचमुखी क्यों हुए महाबली हनुमान, पढ़े महाबली हनुमान के पंचमुखी होने की कथा

आखिर पंचमुखी क्यों हुए महाबली हनुमान, पढ़े महाबली हनुमान के पंचमुखी होने की कथा

जब लंका में महाबलशाली मेघनाद के साथ बहुत ही भीषण युद्ध चला और जिसमें मेघनाद की मृत्यु हो गयी.मेघनाद की मृत्यु बाद रावण जो कि अब तक अपनी जीत मान कर बैठा था वो मेघनाद की मृत्यु और लक्ष्मण का पराक्रम सुनकर तनाव में आ जाता हैं. रावण को इस तरह तनाव में देखकर रावण की मां कैकसी ने उसके पाताल में बसे हुए दो भाइयों अहिरावण और महिरावण की याद दिलाया तब रावण को याद आया कि यह दोनों तो उसके बचपन के दोस्त है.  

लेकिन लंका का राजा बनने के बाद रावण ने उनको पूछा तक नहीं था. रावण यह बात बहुत ही अच्छी तरह जनता था कि अहिरावण व महिरावण तंत्र-मंत्र के महा पंडित, जादू टोने के धनी और मां कामाक्षी के परम भक्त हैं। रावण ने अपने दोनों भाइयों को बुलाया भेजा और कहा की वह अपने छल , बल और कौशल से भगवान श्रीराम व उनके भाई लक्ष्मण का सफाया कर दें. लेकिन यह बात दूतों के जरिये विभीषण को पता चल जाती हैं और युद्ध में अहिरावण और महिरावण जैसे परम मायावी के शामिल होने से विभीषण काफी चिंतित हो जाते हैं. 

अब विभीषण को लगा कि भगवान श्रीराम और लक्ष्मण की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी करनी पड़ेगी, इसके लिए उन्हें सबसे बेहतर लगा कि इसकी जिम्मेदारी वीर हनुमान को देनी चाहिए। राम और लक्ष्मण की कुटिया सुवेल पर्वत पर बनी थी. वीर हनुमान ने भगवान श्रीराम की कुटिया के चारों तरफ एक सुरक्षा घेरा खींच दिया जिसके अंदर जादू - टोना , तंत्र-मन्त्र का असर या मायावी राक्षस या कोई भी इसके अंदर नहीं घुस सकता था. 

अहिरावण और महिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को मारने के लिए उनकी कुटिया तक पहुंच गए पर सुरक्षा घेरा होने की वजह से वो कुछ न कर पाएं और अपने पहले प्रयास में असफल हो गए, लेकिन महिरावण विभीषण का रूप बदल कर कुटिया में घुसने में कामयाब हो जाते हैं. राम व लक्ष्मण पत्थर की सपाट शिलाओं पर गहरी नींद सो रहे थे। दोनों राक्षसों ने बिना आहट के शिला समेत दोनो भाइयों को उठा लिया और अपने निवास पाताल की और लेकर चल दिए।

विभीषण एकदम सतर्क थे और इस घटना के कुछ देर बाद ही उनको पता चल गया कि कोई अनहोनी घटना घट गयी है और लक्ष्मण को महिरावण पर शक था और उन्हें अब राम - लक्ष्मण की चिंता सताने लगी थी. विभीषण ने हनुमान जी को महिरावण के बारे में बताया और कहा कि वे उसका पीछा करें।लंका में अपने रूप में घूमना राम भक्त हनुमान के लिए ठीक न था सो उन्होंने पक्षी का रूप धारण कर लिया और पक्षी का रूप में ही निकुंभला नगर पहुंच गये।

निकुंभला नगरी में पक्षी रूप धरे हनुमान जी ने कबूतर और कबूतरी को आपस में बतियाते सुना। कबूतर, कबूतरी से कह रहा था कि अब रावण की जीत पक्की है। अहिरावण व महिरावण राम-लक्ष्मण को बलि चढा देंगे। बस सारा युद्ध समाप्त।

कबूतर की बातों से वीर हनुमान को पता चल गया कि दोनों राक्षस राम और लक्ष्मण को सोते हुए में ही उठाकर कामाक्षी देवी को बलि चढाने हेतु पाताल लोक लेकर गए हैं. हनुमान जी वायु वेग से रसातल की और बढे और तुरंत वहां पहुंचे। हनुमान जी जब पाताल लोक पहुंचे तो उनको एक बड़ा ही अजीब तरह का पहरेदार मिला जिसका आधा शरीर वानर का और आधा मछली का था। उसने हनुमान जी को पाताल में प्रवेश से रोक दिया।

पाताललोक के द्धारपाल ने वीर हनुमान को बोला कि मुझे हराए बिना आपका अंदर जाना संभव नहीं है और दोनों में लड़ाई ठन गयी, हनुमान जी की आशा के विपरीत यह बड़ा ही बलशाली और कुशल योद्धा निकला। दोनों तरफ के योद्धा काफी बलशाली थे , दोनों में भयंकर युद्ध हुआ पर वह बजरंग बली के आगे टिक नहीं सका. आखिर कार हनुमान जी ने उसे हरा तो दिया पर उस द्वारपाल की प्रशंसा करने से नहीं रह सके।

वीर हनुमान ने उस वीर से पूछा कि हे वीर योद्धा तुम अपना परिचय दो, तुम्हारा स्वरुप भी ऐसा है कि तुम्हारे बारे में जानने की तीव्र इच्छा हो रही है. इसके बाद वीर योद्धा कहता है कि मेरा नाम है मकरध्वज है और मैं वीर हनुमान का पुत्र हूँ और एक मछली के द्धारा पैदा हुआ हूँ. उसकी बात सुनकर हनुमान जी आश्चर्य में पड़ गए और बड़े ध्यान से मकर धवज की बात को सुनने लग गए. मकरध्वज ने कहा- मेरा नाम लंका दहन के बाद हनुमान जी समुद्र में अपनी अग्नि शांत करने पहुंचे। उनके शरीर से पसीने के रूप में तेज गिरा और उसी समय मेरी मां ने खाने के लिए मुंह खोला था. वह तेज मेरी माता ने अपने मुख में ले लिया और गर्भवती हो गई। उसी से मेरा जन्म हुआ है। हनुमान जी ने जब यह सुना तो मकरध्वज को बताया कि वह ही हनुमान हैं।

यह सुनने के बाद मकर ध्वज ने हनुमान जी के पैर छुए और वीर हनुमान ने भी अपने बेटे को गले से लगाया और यहां आने का पूरा कारण बता दिया। उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि अपने पिता के स्वामी की रक्षा में सहायता करो.मकरध्वज ने हनुमान जी को बताया कि कुछ ही देर में राक्षस बलि के लिए आने वाले हैं। बेहतर होगा कि आप रूप बदल कर कामाक्षी कें मंदिर में जा कर बैठ जाएं। उनको सारी पूजा झरोखे से करने को कहें।

इसके उपरांत हनुमान जी ने पहले तो मधु मक्खी का रूप बदल कर मां कामाक्षी के मंदिर में घुस गए और हनुमान जी ने मां कामाक्षी को नमस्कार कर सफलता की कामना की और फिर पूछा- हे मां क्या आप वास्तव में श्री राम जी और लक्ष्मण जी की बलि चाहती हैं ?

वीर हनुमान के इस प्रश्न के बाद मां कामाक्षी ने उत्तर दिया कि नहीं मैं तो सिर्फ दुष्ट अहिरावण व महिरावण की बलि चाहती हूं. दोनों मेरे परम भक्त है पर दोनों बहुत ही अधर्मी और अत्याचारी बहुत है , अगर आप अपने प्रयत्न करोगे तो सफल जरूर रहोगे। मंदिर में पांच दीप जल रहे थे। अलग-अलग दिशाओं और स्थान पर मां ने कहा यह दीप अहिरावण ने मेरी प्रसन्नता के लिए जलाये हैं जिस दिन ये एक साथ बुझा दिए जा सकेंगे, उसका अंत सुनिश्चित हो सकेगा।

इसी बीच बहुत ही ढोल- नगाड़ों का शोर सुनाई पड़ने लगा.अहिरावण और महिरावण बलि चढ़ाने के लिए आ रहे थे. हनुमान जी ने अब मां कामाक्षी का रूप धारण कर लिया। जब अहिरावण और महिरावण मंदिर में प्रवेश करने ही वाले थे कि हनुमान जी का महिला स्वर गूंजा। हनुमान जी बोले- मैं कामाक्षी देवी हूं और आज मेरी पूजा झरोखे से करो। झरोखे से पूजा आरंभ हुई ढेर सारा चढावा मां कामाक्षी को झरोखे से चढाया जाने लगा। अंत में बंधक बलि के रूप में राम लक्ष्मण को भी उसी से डाला गया। दोनों बंधन में बेहोश थे।

हनुमान जी ने तुरंत उन्हें बंधन मुक्त कर दिया और पाताललोक से निकालना रह गया था  उससे पहले मां कामाक्षी के सामने अहिरावण महिरावण की बलि देकर उनकी इच्छा पूरी करना और दोनों राक्षसों को उनके किए की सज़ा देना शेष था।इसके बाद हनुमान जी ने मकर ध्वज को कहा कि वो बेहोश अवस्था में लेते हुए भगवान राम और लक्ष्मण का एकदम खास ख्याल रखे और उसके साथ  उसके साथ मिलकर दोनों राक्षसों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। लेकिन यह युद्ध बिलकुल भी आसान न था. अहिरावण और महिरावण बडी मुश्किल से मरते तो फिर पाँच पाँच के रूप में जिदां हो जाते। इस विकट स्थिति में मकरध्वज ने बताया कि अहिरावण की एक पत्नी नागकन्या है।

अहिरावण ने उसे बल बलपूर्वक अपहरण करके लाया है और उसको ये बिल्कुल भी पसंद नहीं है, वो तो उसके साथ मन मार कर साथ हैं. वह अहिरावण के सारे राज जानती हैं और उससे ही मृत्यु का राज पूछा जाये। उससे सहायता ली जाये। मकरध्वज ने राक्षसों को युद्ध में उलझाये रखा और उधर हनुमान अहिरावण की पत्नी के पास पहुंचे। नागकन्या से उन्होंने कहा कि यदि तुम अहिरावण के मृत्यु का भेद बता दो तो हम उसे मारकर तुम्हें उसके चंगुल से मुक्ति दिला देंगे।

अहिरावण की पत्नी कहती है कि मेरा नाम चित्रसेना हैं और मैं भगवान विष्णु की बहुत बड़ी भक्त हूँ .मेरे रूप पर अहिरावण मर मिटा और मेरा अपहरण कर यहां कैद किये हुए है, पर मैं उसे नहीं चाहती। लेकिन मैं अहिरावण का भेद तभी बताउंगी जब मेरी इच्छा पूरी की जायेगी। इस पर वीर हनुमान ने अहिरावण की पत्नी आपकी क्या इच्छा है आप बताएं उसे मैं जरूर पूरा करूँगा। इस बात पर अहिरावण की पत्नी ने दुर्भाग्य से अहिरावण जैसा असुर मुझे हर लाया. इससे मेरा जीवन खराब हो गया. मैं अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलना चाहती हूं। आप अगर मेरा विवाह श्री राम से कराने का वचन दें तो मैं अहिरावण के वध का रहस्य बताऊंगी।

इस बात को सुनकर हनुमान जी बहुत ज्यादा सोच में पड़ गए. क्योकि प्रभु श्रीराम तो एक पत्नीनिष्ठ हैं और वो ये युद्ध भी अपनी पत्नी सीता को मुक्त करवाने के लिए लड़ रहे हैं. वह किसी और से विवाह की बात तो कभी न स्वीकारेंगे। मैं कैसे वचन दे सकता हूं ?फिर सोचने लगे कि यदि समय पर उचित निर्णय न लिया तो स्वामी के प्राण ही संकट में हैं. असमंजस की स्थिति में बेचैन हनुमानजी ने ऐसी राह निकाली कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

हनुमान जी बोले- तुम्हारी शर्त स्वीकार है पर हमारी भी एक शर्त है. यह विवाह तभी होगा जब तुम्हारे साथ भगवान राम जिस पलंग पर आसीन होंगे वह सही सलामत रहना चाहिए। यदि वह टूटा तो इसे अपशकुन मांगकर वचन से पीछे हट जाऊंगा।

चित्रसेना ने सोचा जब महाकाय अहिरावण के बैठने से पलंग नहीं टूटता तो श्रीराम के बैठने से कैसे टूटेगा। उसने अहिरावण समेत सभी राक्षसों के अंत का सारा भेद बता दिया.चित्रसेना ने कहा- दोनों राक्षसों के बचपन की बात है. इन दोनों के कुछ शरारती राक्षस मित्रों ने कहीं से एक भ्रामरी को पकड़ लिया। मनोरंज के लिए वे उसे भ्रामरी को बार-बार काटों से छेड रहे थे।भ्रामरी साधारण भ्रामरी न थी। वह भी बहुत मायावी थी किंतु किसी कारण वश वह पकड़ में आ गई थी। भ्रामरी की पीड़ा सुनकर अहिरावण और महिरावण को दया आ गई और अपने मित्रों से लड़ कर उसे छुड़ा दिया।

मायावी भ्रामरी का पति भी अपनी पत्नी की पीड़ा सुनकर आया था। अपनी पत्नी की मुक्ति से प्रसन्न होकर उस भौंरे ने वचन दिया था कि तुम्हारे उपकार का बदला हम सभी भ्रमर जाति मिलकर चुकाएंगे।ये भौंरे अधिकतर उसके शयन कक्ष के पास रहते हैं। ये सब बड़ी भारी संख्या में हैं। दोनों राक्षसों को जब भी मारने का प्रयास हुआ है और ये मरने को हो जाते हैं तब भ्रमर उनके मुख में एक बूंद अमृत का डाल देते हैं।

उस अमृत के कारण ये दोनों राक्षस मरकर भी जिंदा हो जाते हैं। इनके कई-कई रूप उसी अमृत के कारण हैं। इन्हें जितनी बार फिर से जीवन दिया गया उनके उतने नए रूप बन गए हैं. इस लिए आपको पहले इन भंवरों को मारना होगा।हनुमान जी रहस्य जानकर लौटे। मकरध्वज ने अहिरावण को युद्ध में उलझा रखा था। तो हनुमान जी ने भंवरों का खात्मा शुरू किया। वे आखिर हनुमान जी के सामने कहां तक टिकते।

जब सारे भ्रमर खत्म हो गए और केवल एक बचा तो वह हनुमान जी के चरणों में लोट गया। उसने हनुमान जी से प्राण रक्षा की याचना की। हनुमान जी पसीज गए। उन्होंने उसे क्षमा करते हुए एक काम सौंपा।हनुमान जी बोले- मैं तुम्हें प्राण दान देता हूं पर इस शर्त पर कि तुम यहां से तुरंत चले जाओगे और अहिरावण की पत्नी के पलंग की पाटी में घुसकर जल्दी से जल्दी उसे पूरी तरह खोखला बना दोगे।

भंवरा तत्काल चित्रसेना के पलंग की पाटी में घुसने के लिए प्रस्थान कर गया। इधर अहिरावण और महिरावण को अपने चमत्कार के लुप्त होने से बहुत अचरज हुआ पर उन्होंने मायावी युद्ध जारी रखा।भ्रमरों को हनुमान जी ने समाप्त कर दिया फिर भी हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों अहिरावण और महिरावण का अंत नहीं हो पा रहा था। यह देखकर हनुमान जी कुछ चिंतित हुए।

फिर उन्हें कामाक्षी देवी का वचन याद आया। देवी ने बताया था कि अहिरावण की सिद्धि है कि जब पांचो दीपकों एक साथ बुझेंगे तभी वे नए-नए रूप धारण करने में असमर्थ होंगे और उनका वध हो सकेगा।हनुमान जी ने तत्काल पंचमुखी रूप धारण कर लिया। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख।

उसके बाद हनुमान जी ने अपने पांचों मुख द्वारा एक साथ पांचों दीपक बुझा दिए। अब उनके बार बार पैदा होने और लंबे समय तक जिंदा रहने की सारी आशंकायें समाप्त हो गयीं थी। हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों शीघ्र ही दोनों राक्षस मारे गये।इसके बाद उन्होंने श्री राम और लक्ष्मण जी की मूर्च्छा दूर करने के उपाय किए। दोनो भाई होश में आ गए। चित्रसेना भी वहां आ गई थी। हनुमान जी ने कहा- प्रभो ! अब आप अहिरावण और महिरावण के छल और बंधन से मुक्त हुए।

पर इसके लिए हमें इस नागकन्या की सहायता लेनी पड़ी थी। अहिरावण इसे बल पूर्वक उठा लाया था। वह आपसे विवाह करना चाहती है। कृपया उससे विवाह कर अपने साथ ले चलें। इससे उसे भी मुक्ति मिलेगी।श्री राम हनुमान जी की बात सुनकर चकराए। इससे पहले कि वह कुछ कह पाते हनुमान जी ने ही कह दिया- भगवन आप तो मुक्तिदाता हैं। अहिरावण को मारने का भेद इसी ने बताया है। इसके बिना हम उसे मारकर आपको बचाने में सफल न हो पाते।

कृपा निधान इसे भी मुक्ति मिलनी चाहिए। परंतु आप चिंता न करें। हम सबका जीवन बचाने वाले के प्रति बस इतना कीजिए कि आप बस इस पलंग पर बैठिए बाकी का काम मैं संपन्न करवाता हूं।हनुमान जी इतनी तेजी से सारे कार्य करते जा रहे थे कि इससे श्री राम जी और लक्ष्मण जी दोनों चिंता में पड़ गये। वह कोई कदम उठाते कि तब तक हनुमान जी ने भगवान राम की बांह पकड़ ली।

हनुमान जी ने भावा वेश में प्रभु श्री राम की बांह पकड़कर चित्रसेना के उस सजे-धजे विशाल पलंग पर बिठा दिया। श्री राम कुछ समझ पाते कि तभी पलंग की खोखली पाटी चरमरा कर टूट गयी।पलंग धराशायी हो गया। चित्रसेना भी जमीन पर आ गिरी। हनुमान जी हंस पड़े और फिर चित्रसेना से बोले- अब तुम्हारी शर्त तो पूरी हुई नहीं, इसलिए यह विवाह नहीं हो सकता। तुम मुक्त हो और हम तुम्हें तुम्हारे लोक भेजने का प्रबंध करते हैं।

चित्रसेना समझ गयी कि उसके साथ छल हुआ है। उसने कहा कि उसके साथ छल हुआ है। मर्यादा पुरुषोत्तम के सेवक उनके सामने किसी के साथ छल करें यह तो बहुत अनुचित है। मैं हनुमान को श्राप दूंगी।चित्रसेना हनुमान जी को श्राप देने ही जा हे रही थी कि श्री राम का सम्मोहन भंग हुआ। वह इस पूरे नाटक को समझ गये। उन्होंने चित्रसेना को समझाया- मैंने एक पत्नी धर्म से बंधे होने का संकल्प लिया है। इस लिए हनुमान जी को यह करना पड़ा। उन्हें क्षमा कर दो।

क्रुद्ध चित्रसेना तो उनसे विवाह की जिद पकड़े बैठी थी। श्री राम ने कहा- मैं जब द्वापर में श्री कृष्ण अवतार लूंगा तब तुम्हें सत्यभामा के रूप में अपनी पटरानी बनाउंगा। इससे वह मान गयी।हनुमान जी ने चित्रसेना को उसके पिता के पास पहुंचा दिया. चित्रसेना को प्रभु ने अगले जन्म में पत्नी बनाने का वरदान दिया था। भगवान विष्णु की पत्नी बनने की चाह में उसने स्वयं को अग्नि में भस्म कर लिया।श्री राम और लक्ष्मण, मकरध्वज और हनुमान जी सहित वापस लंका में सुवेल पर्वत पर लौट आये।