जाने हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग से जुडी पौणानिक कथा

जाने हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग से जुडी पौणानिक कथा

हिन्दू धर्म में भगवान शिव के 12 ज्योतिलिंगों के बारे में बताया गए है, ऐसा ही एक है  हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग। आइये जानते है क्या है इसके पीछे की कहानी। गाज़ियाबाद के पास बिसरख नामक एक गाँव है। पहले यहाँ घना जंगल था। रावण के पिता विश्वेश्रवा ने यहाँ तपस्या की थी। वह शिव के परम भक्त थे। अब गौतमबुद्धनगर ज़िले में पड़ने वाले रावण के पैत्रक गाँव बिसरख में आज भी वह पूजनीय है। इस गाँव में न तो रामलीला का मंचन होता है और न ही दशहरा पर्व मनाया जाता है। इस गाँव का नाम ऋषि विश्वेश्रवा के नाम पर विश्वेश्वरा पड़ा ,कालांतर में इसे बिसरख कहा जाने लगा।

त्रेतायुग में श्री रामावतार से पूर्व कुबेर के पिता महर्षि पुलस्त्य बिसरख क्षेत्र में ही निवास करते थे। महर्षि पुलस्त्य का विवाह महर्षि भारद्वाज की बहन से हुआ था। कुबेर इसी भाग्यशाली दम्पति के सुपुत्र थे। कुबेर ब्रह्मा जी के पौत्र तथा भगवान् शिव के अनन्य मित्र और देवलोक के कोषाध्यक्ष थे। अपनी व्यस्तताओं के कारण कुबेर के पास इतना समय नहीं था कि वह अपने पिता को भी थोडा समय दे सके। इसी के चलते महर्षि पुलस्त्य अपने बेटे से न मिल पाने के कारण कुंठित रहा करते थे। कुबेर को भी अपने पिता की सेवा न कर पाने का कष्ट था ,लेकिन समयाभाव के कारण इस समस्या का कोई समाधान उनके पास नहीं था।

महर्षि पुलस्त्य प्रकांड विद्वान थे। उन्होंने एक दिन सोचा: यदि पुत्र कुबेर के परम मित्र ओढरदानी भगवान् शिव को प्रसन्न कर उन्हें अपने पास रख लूँ तो समस्या का समाधान स्वत: हो जायेगा। कुबेर अपने परम मित्र शिवजी से मिलने आया करेगा तो मैं भी उससे मिल लिया करूँगा। पल दो पल ही सही मेरा पुत्र कुबेर मेरे पास बैठ लिया करेगा। बाप-बेटे दुःख-सुख की बातें कर लिया करेंगे।

यही सबसे सही उपाय है: ऐसा सोच कर महर्षि पुलस्त्य ने भगवान् शिव को प्रसन्न करने के लिये कठोर तप करने का निर्णय लिया। बिसरख की भीड़-भाड़ व चहल-पहल तपस्या में व्यवधान उत्पन्न करती इसलिये महर्षि पुलस्त्य ने हिन्डन के निकट घने वन को अपनी तपस्या के लिये चुना। उन्होंने भगवान् भोले नाथ की वर्षों तक निरंतर आराधना की। बिना किसी बाधा के जारी उनकी तपस्या ने अपना रंग दिखाया। महर्षि पुलस्त्य की सिद्धि यहाँ तक पहुँची की वे स्वयं भगवान शंकर के रूप हो गये।

महर्षि पुलस्त्य की तापोराधना से प्रसन्न होकर भगवान् भोलेनाथ माता पार्वती सहित साक्षात प्रगट हुए। भगवान् शिव ने महर्षि पुलस्त्य से कहा: मैं तुम्हारी आराधना से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं काशी और कैलाश में वास करता हूँ। तुम्हारी इच्छा है की मैं यहाँ वास करूँ। काशी तो मेरे त्रिशूल पर टिकी है ,दूसरा त्रिशूल मेरे पास नहीं है ,इसलिये यहाँ काशी तो बन नहीं सकती। हाँ ,यदि तुम चाहो तो यहाँ कैलाश जरुर बन सकता है।

इसपर महर्षि पुलस्त्य ने कहा: प्रभो ! आप यहाँ कैलाश बनाने की आज्ञा दें और उसी में वास करें: इसमें मेरा स्वार्थ तो निश्चित रूप से है लेकिन जनकल्याण की भावना भी इसमें निहित है। आपके आशीर्वाद से जन-जन का कल्याण अनंतकाल तक होता रहेगा।

महर्षि पुलस्त्य ने जिस स्थान पर घोर तप किया और शिवस्वरूप हो विश्वेश्रवा कहलाये: जिस स्थान पर भगवान् शिव ने विश्वेश्रवा को माता पार्वती के साथ साक्षात् दर्शन दिये और उन्हें कैलाश बनाने की आज्ञा दी, जिस स्थान पर अपनी पहचान के रूप में भगवान् भोलेनाथ हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग छोड़ गये ,वही स्थान आज श्री दूधेश्वर नाथ महादेव मठ मंदिर के नाम से जाना जाता है। यही वह अति पावन ज्योतिर्लिंग है , जिसके दर्शन मात्र से भक्तों की मनोकामनायें पूर्ण हो जाती हैं। यही वह मंगलकारी दूधनियन्ता भगवान् भोलेनाथ का दूधेश्वर लिंग है जिसके अभिषेक से जन्म-जन्म के पापों से मुक्ति मिल जाती है

शिव साधक विश्वेश्रवा का पुत्र रावण भी अपने तपस्वी पिता की भांति ही भगवान् शिव का अनन्य भक्त था। शिवजी के प्रति रावण की भक्ति जगविदित एवं अनुकरणीय है। अपने पिता के तपोबल से विकसित कैलाश में हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग श्री दूधेश्वर की रावण ने भी वर्षों तक साधना की थी। रावण यहाँ तब तक श्री दूधेश्वर का अभिषेक करता रहा था जब तक महर्षि विश्वेश्रवा सपरिवार स्वर्ण नगरी लंका में नहीं जा बसे थे।

इसी पुराण वर्णित हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग को श्री दूधेश्वर नाथ महादेव के नाम से जाना व पूजा जाता है।