जानिए भगवान विष्णु को किस किस ने क्या क्या श्राप दिया ?

जानिए भगवान विष्णु को किस किस ने क्या क्या श्राप दिया ?

हमारे इतिहास में अपने बहुत से श्राप सुने होंगे लेकिन क्या आपको पता है की भगवान् विष्णु को भी आधे दर्जन से भी ज्यादा ऐसे ऐसे श्राप मिले है जो की उन्हें भोगने पड़े. आज हम किसी पर सबसे ज्यादा गुस्सा होते है तो उसको मारने तक की धमकी दे देते है या मन ही मन उसको मारने की सोच लेते है. लेकिन उससे अगर अपना स्वार्थ हो या फिर वो अपना ही प्रेमी हो तो ठीक है ठीक है कोई बात नहीं कह के मामले को निपटा देते है.

लेकिन जब दौर धर्म का था यानी की सतयुग जिस समय सभी मनुष्य ब्राह्मण और तपस्वी हुआ करते थे उस समय इन सब के स्थान पर श्राप का इस्तेमाल होता था. अवल तो कोई क्रोधी होता ही नहीं था लेकिन जब सामने वाले से कुछ अपराध हो जाता था तो श्राप से ही गुस्सा निकलता था जिसका परिणाम बहुत भयानक होता था.

हालाँकि महापुरुषों के श्राप में भी कंही न कंही कल्याण ही छुपा रहता है और वो ही श्राप कालांतर में वरदान साबित हो जाता था. ऐसा भी नहीं है की सिर्फ मनुष्यो और देवताओ को ही श्राप दिए जाते थे ब्राह्मणो के द्वारा बल्कि स्वयं भगवान् विष्णु भी श्राप पाने वालो में शुमार थे. सबसे पहला श्राप (जो भगवान् विष्णु को मिला) और हमें याद है वो था ऋषि भृगु द्वारा भगवान् विष्णु को दिया गया श्राप. ऋषि उशना (शुक्राचार्य) की माँ और भृगु की दूसरी पत्नी काव्यमाता ने राक्षसों को तब शरण दी थी जब शुक्राचार्य संजीवनी मन्त्र की प्राप्ति के लिए शिव जी की तपस्या कर रहे थे.

उस समय वो दैत्यों को मारने आने वाले देवताओ को भी मूर्छित करने लगी थी तब भगवान् विष्णु ने लोक कल्याण के लिए उनका वध कर दिया था. उस समय भृगु ऋषि ने उन्हें श्राप दिया था की उन्हें भी अपनी पत्नी का विरह सेहन करना पड़ेगा और माँ के गर्भ में भी रहना पड़ेगा. उसके पहले भगवान् विष्णु प्रकट ही होते थे इस श्राप के बाद में ही उन्होंने परशुराम, राम कृष्ण और बुद्ध रूप में माँ के गर्भ में रह पीड़ा सेहन करनी पड़ी थी (राम कृष्ण ने सीता और राधा का विरह सेहन किया था)

इसी क्रम में जब तपस्या के दौरान नारद जी ने कामदेव को भी हरा दिया था जिसे भगवान् शिव भी नहीं हरा पाए थे तो वो घमंड में चूर थे. तब भगवान् विष्णु ने उनके घमंड को तोड़ने के लिए माया रची और नारद के मन में विवाह का विचार पैदा किया जिसके चलते नारद ने स्वयंवर जितने के लिए भगवान् से अपना कोई रूप माँगा. तब विष्णु जी ने उन्हें हरी (वानर) रूप दिया और स्वयंवर में अपमानित होकर नारद जी ने श्राप दिया की उन्हें पग पग पर वानरों की सहायता लेनी पड़ेगी. इसी श्राप के चलते और भृगु के श्राप के चलते रामावतार की पटकथा तैयार हुई मतलब भगवान् को भी कर्मो का फल मिलता है.

ऋषि दाधीच भगवान् शिव के भक्त थे उनके एक मित्र थे राजा वपु, दोनों में एक बार सर्वोत्तम कौन की बहस हो गई और गुस्साए राजा ने दधीचि को पिट कर उनकी हड्डी पसली तोड़ दी. तब शिव जी ने अपने भक्त को ठीक किया और उनकी हड्डिया वज्र की बना दी (जिनसे आगे चलके वज्र बना) तब दधीचि ने फिर राजा को अपमानित किया.

राजा ने तब भगवान् विष्णु से बदले की मांग की, भक्त वत्सल विष्णु ने कहा की ब्राह्मण ही श्रेष्ठ है लेकिन तुम्हारे कहने पर में कोशिश करता हूँ. तब भगवान् ने भेष बदल कर ऋषि से वपु को श्रेष्ठ मानने की विनती के लेकिन दधीचि उन्हें पहचान गए और अपमानित होने का श्राप दे दिया. इसी श्राप के चलते दक्ष यज्ञ में वीरभद्र के सामने भगवान् विष्णु को मैदान छोड़ कर भागना पड़ा था, इसी यज्ञ के बाद सती की देह को ले जाते प्रलय मचाने को आतुर शिव को देख भगवान् विष्णु ने सती की देह के 52 टुकड़े कर दिए थे. तब शिव ने उन्हें श्राप दिया की माया सती के शरीर से तुमने मेरा वियोग करवाया है तुम्हे भी माया सीता से वियोग होगा (रामायण).

शंखचूड़ के वध के लिए भगवान् विष्णु को सती वृंदा का पति व्रत भंग करना जरुरी था इसलिए वो छल से उसके पति के रूप में उसके पास आये. जब शंखचूड़ मारा गया तो सती वृंदा ने भगवान् विष्णु को पत्थर की शिला हो जाने का श्राप दिया था, बाद में वो शिला ही शालिग्राम हो गई. सती वृंदा की चिता की राख से तुलसी उगी और उसी से आज भी शालिग्राम जी का विवाह होता है, ऐसे ही जब देवताओ की अर्जी पर पार्वती जी शिव जी के तेज को अपने गर्भ में धारण नहीं कर पाई तो उन्होंने देवताओ को आजीवन निसंतान होने का श्राप दिया था.