जानिए बबरीक की कथा जिसकी होती है राजस्थान में पूजा

जानिए बबरीक की कथा जिसकी होती है राजस्थान में पूजा

माता हिडिम्बा ने कहा पुत्र जो व्यक्ति कर्मफल की आशक्ति त्याग देता है,काम,क्रोध,मद,लोभ,दुर्भाव और द्वेष में नियंत्रण पा लेता है और कर्म बन्धन से पूरी तरह छूट जाता है उसे ही मोक्ष प्राप्त होता है,किन्तु यह प्रक्रिया बहुत लंबी होती है जन्म-जन्म तक चलती है। दादी माता की यह बात सुनकर बर्बरीक ने कहा कि दादी माँ यह तो बहुत समय वाला मार्ग है,कोई ऐसा मार्ग बताइये की मुझे बहुत जल्दी मोक्ष प्राप्त हो जाये। तब माता हिडिम्बा ने कहा कि पुत्र यदि स्वयं परमब्रह्म परमेश्वर श्री हरी कृष्ण किसी का अपने हांथों वध कर देते हैं तो वह भी कर्मफल की आशक्ति से मुक्त होकर ब्रह्म में लीन हो जाता है और उसे मोक्ष प्राप्ति हो जाती है,किन्तु श्री हरि कृष्ण किसी का अकारण ही वध नहीं करते हैं।

तब बर्बरीक जी ने कहा कि दादी माँ मैं कठोर तप करँगा और महाशक्तिशाली बनकर कौरवों के तरफ से युद्ध करूँगा तब तो श्री कृष्ण को मेरा वध करना ही पड़ेगा,ऐसा कहकर बर्बरीक वहां से एक सिद्ध स्थान पर तप करने के लिए निकल पड़ते हैं। बर्बरीक वर्षों तक कठोर तप करके सिद्ध माता भवानी को प्रसन्न कर लेते हैं,माता उन्हें अपने नवों रूपों का दर्शन देती हैं,ततपश्चात माँ भवानी बर्बरीक को वासुदेव अस्त्र और अपराजिता वैष्णवी महाविद्या की शिक्षा देती हैं। अपराजिता वैष्णवी महाविद्या प्राप्त करने के बाद बर्बरीक महाभारत काल के सर्वशक्तिमान योद्धा बन जाते हैं। महाशक्तिमान बन जाने के पश्चात बर्बरीक कुरुक्षेत्र के लिए कूच करते हैं।बर्बरीक ने मन ही मन मंशा बनाई हुई थी कि श्री कृष्ण को अपना वध करने पे मजबूर करने के लिए मैं एक ही बाण में महाभारत के सारे योद्धाओं को खत्म करने की अपनी क्षमता का श्री कृष्ण के सामने ही प्रदर्शन करूँगा।

मार्ग में भगवान श्री हरी कृष्ण बर्बरीक को दर्शन देते हैं,और बर्बरीक को उनका युद्ध कौशल दिखाने के लिए कहते हैं,बर्बरीक एक ही बाण से हजारों पत्तों वाले पीपल के एक वृक्ष के सभी पत्तों में छेद कर देते हैं।श्री कृष्ण समझ जाते हैं कि बर्बरीक ने अपराजिता वैष्णवी महाविद्या की शिक्षा ली है।और बर्बरीक पाण्डवों के विरुद्ध युद्ध करने आया है।तब क्षण भर में ही बिजली की तरह कौंधता हुआ सुदर्शन चक्र भगवान के हांथों में प्रकट हुआ। सुदर्शन चक्र देखकर बर्बरीक ने हाँथ जोड़कर भगवान को नमन किया और कहा कि हे भगवन आपके हांथों मृत्यु प्राप्त कर मोक्ष प्राप्ति के लिए ही मैंने इतना कठोर श्रम किया था किंतु मैं इस महान महाभारत युद्ध को मृत्यु के बाद भी देखना चाहता हूं।श्री हरि कृष्ण ने तथास्तु कहते हुए महान बर्बरीक का सर धड़ से अलग कर दिया। श्री कृष्ण की इच्छा से मृत्यु पश्चात भी बर्बरीक जी का सिर महाभारत युद्ध होने तक जीवित रहा,और बर्बरीक ने महाभारत युद्ध का पूर्ण साक्षात्कार किया।

श्री कृष्ण के आशीर्वाद से बर्बरीक जी को मोक्ष के साथ-साथ अखण्ड यश और कीर्ति मिली एवं उन्हें खाटू श्याम जी के नाम से जाना जाने लगा। आज भी राजस्थान में खाटू श्याम जी का बहुत प्रसिद्ध मंदिर बना हुआ है,मान्यता है की उनके मंदिर में जाने वाले के समस्त दुख दर्द दूर हो जाते हैं।