जाने प्रभु अय्यप्पा की याद में बने वालिया कोयिकल मंदिर के बारे में

जाने प्रभु अय्यप्पा की याद में बने वालिया कोयिकल मंदिर के बारे में

प्रभु अय्यप्पा को लेकर श्रद्धालुओं में अलग-अलग तरह की मान्यताएँ प्रचलित हैं। इनमें सबसे ज्यादा प्रचलित मान्यता प्रभु अय्यप्पा के इनसान के रूप में राजा पंडालम के घर जन्म से जुड़ी हुई है। इस समय राजा राजशेखर पंडालम के राजा थे। एक बार अय्यप्पाजी शिशु के रूप में राजा राजशेखर को पंपा नदी के किनारे मिले। पौराणिक कथाओं के अनुसार शिशु के गले में मणिमाला डली हुई थी। राजा राजशेखर एक पवित्र विचारों वाले प्रभुभक्त थे। निःसंतान राजा ने तुरंत इस ओजस्वी बालक को गोद में ले लिया और बालक को प्रभु का वरदान मान अपना पुत्र मान लिया।

उन्होंने पुत्र का नाम मणिकंठ रखा। मणिकंठ को अच्छी शिक्षा-दीक्षा दी गई। वह राजगद्दी का उत्तराधिकारी बना। कुछ समय बाद राजा राजशेखर की पत्नी ने एक और पुत्र को जन्म दिया। रानी के सेवकों और मंत्रियों ने रानी के कान भरना शुरू किए कि एक अनाथ बालक के कारण रानी का पुत्र राजगद्दी से वंचित रह जाएगा। मणिकंठ को रास्ते से हटाने के लिए रानी ने एक चाल चली। उन्होंने राजवैद्य को धन का लालच देकर कहा कि वह मणिकंठ को बताए कि उसकी माँ काफी बीमार हैं और उनके प्राणों की रक्षा के लिए चीते का दूध चाहिए।

माँ को बचाने के लिए मणिकंठ ने चीते का दूध लाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। वह चीते का दूध ले आया, लेकिन जल्द ही माँ और मंत्रीगणों की चाल समझ गया। वहीं सभी को समझ में आ गया कि मणिकंठ एक सामान्य युवा नहीं है। उसमें दैवीय शक्ति है, लेकिन मणिकंठ ने महल छोड़ने का निर्णय ले लिया था।

वहीं राजा को भी रानी की चाल समझ में आ चुकी थी। राजा ने मणिकंठ से विनती की कि वह न जाए। मणिकंठ ने राजा को समझाया कि विनती की आवश्यकता नहीं, वह हमेशा उनका पुत्र ही रहेगा। इसके बाद मणिकंठ ने राजा को मोक्ष का रास्ता दिखाते हुए कहा कि आप पवित्र पंपा नदी के किनारे एक मंदिर बनवाएँ। वहाँ भक्त मणिकंठ अर्थात भगवान अय्यप्पा के दर्शन कर सकते हैं। यही मंदिर शबरीमला के नाम से जाना जाता है।
मकरविलक शबरीमला मंदिर का चरमबिंदु है। यह हर साल चौदह जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन प्रभु अय्यप्पा को पंडालम से लाए स्वर्ण आभूषणों से सजाया जाता है।

शशिमोहन पौराणिक मान्यता है कि शबरीमला मंदिर में प्रतिष्ठित भगवान श्री अय्यप्पा ने धरती पर मानव रूप में जन्म लिया था। वे किसके घर में जन्मे यह अज्ञात है, लेकिन उनकी परवरिश राजा पंडालम के घर हुई। राजा पंडालम ने ही अचिनकोविल नदी के मुहाने पर एक मंदिर बनवाया था, जिसे ‘वालिया कोयिकल’ नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि यह मंदिर और शबरीमला मंदिर का निर्माण राजा पंडालम ने ही अपने मानस पुत्र की याद और भक्ति में करवाया था।

प्रभु अय्यप्पा ने अपना युवाकाल पंडालम राज्य में बिताया था, इसलिए इस मंदिर की महत्ता काफी ज्यादा है। शबरीमला में दर्शन करने आने वाले श्रद्धालु पहले वालिया कोयिकल मंदिर में दर्शन करते हैं।      
यहाँ गौर करने लायक बात यह है कि शबरीमला में प्रतिष्ठित भगवान अय्यप्पा की प्रतिमा को मकराविलकू के दिन खासतौर पर पंडालम महल से लाए गए गहनों से श्रृंगारित किया जाता है। मकराविलकू लगभग दो माह तक चलता है। इन दिनों में ये गहने आम श्रद्धालुओं के दर्शन हेतु खोल दिए जाते हैं। इस समय इन गहनों को एक खूबसूरत जुलूस के जरिये पंडालम से शबरीमला तक ले जाया जाता है। आसमान में उड़ता हुआ बाज देखने के बाद ही यह जुलूस शुरू किया जाता है। हर साल लगातार यहाँ जुलूस से पहले आसमान में बाज दिखाई देता है। ऐसा माना जाता है यह चमत्कार सिर्फ अय्यप्पा भगवान के कारण होता है। गहनों को पंडालम से शबरीमला तक ले जाने वाले जुलूस की रक्षा का दायित्व आज भी पंडालम का राजघराना लेता है। राजपरिवार के लोग खासतौर पर इस जुलूस में शामिल होते हैं। यह जुलूस इस साल बारह जनवरी को निकाला जाएगा। मकरविलक शबरीमला मंदिर का चरमबिंदु है। यह हर साल चौदह जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन प्रभु अय्यप्पा को पंडालम से लाए स्वर्ण आभूषणों से सजाया जाता है।