जब कुत्ते का रूप धर भगवान् स्वयं आये भक्ति की परीक्षा लेने

जब कुत्ते का रूप धर भगवान् स्वयं आये भक्ति की परीक्षा लेने

श्री नर्मदा किनारे एक उच्च कोटि के संत विराजते थे जिनका नाम श्री वंशीदास ब्रह्मचारी जी था । उनका नित्य का नियम था की वे भगवान् को तो भोग लगते और साथ में एक अतिथि को भी भोजन प्रसाद खिलाते । ऐसा कारण के बाद ही वो स्वयं प्रसाद पाते थे । नित्य प्रति बे भगवान् को भोग लगते और इंतजार करते की कोई अतिथि आये । कोई न कोई अतिथि मिल ही जाता, कोई नहीं आया तो नर्मदा जी में मछली कछुआ को खिलाते।

एक दिन कोई अतिथि नहीं आया और ना ही कोई कछुआ मछली कुछ दिखाई पड़ रहे थे । ब्रह्मचारी जी सोचने लगे की क्या आज का अन्न & ऐसे ही चला जायेगा।

बहुत समय बीत गया पर कोई दिखाई नहीं पड रहा था , अचानक संत के पास एक कुत्ता आया । कुत्ते को देखकर उसे डराकर भगा दिया  । जैसे ही भगाया ,तुरंत उसके बाद संत जी को ख्याल आया की कही अतिथि नारायण के रूप में कुत्ता ही न आया हो।

उन्होंने सोचा की यही तो होगा वह, कितनी दूर गया होगा परंतु दूर दूर तक खली जमीन दिखाई पद रही थी । पश्चाताप करने लगे की इतनी देर बाद आखिर कोई अतिथि आया था पर हमने उसे भगा दिया । शाम बीत चुकी है ,अब तो मेरा नियम भंग हो गया । उस कुत्ते को बहुत ढूंधा पर कही दिखा नहीं । फिर आँख बंद करके नदी किनारे रोने लग गए , अब भगवान को दया आयी और प्रभु अचानक सामने उसी रूप में प्रकट हुए।

इस बार संत जी ने पहचान ने में भूल नहीं की और उस कुत्ते के चरण पकड़ कर कहने लगे की प्रभु ! मैं पहचान गया हूँ । आप भक्तवत्सल है ,मेरे अतिथि सत्कार के नियम की परीक्षा करने ही आप आये थे । कृपा कर के आप अपने रूप में आकर दर्शन प्रदान करो ।

भगवान् श्री रामचंद्र जी ने अपने निज स्वरुप का दर्शन कराया और संत जो को आनंद प्रदान किया । भगवान् श्री राम ने संत जी से कहा की जब जीवन में कोई नियम ले लेता है तो समय आनेपर उसके नियम निष्ठा की परीक्षा अवश्य होती है । यदि वह व्यक्ति नियम में दृढ़ विश्वास रखे तो भगवान् उस नियम को भंग नहीं होने देते । इस तरह श्रीराम जी ने संत जी के नियम की रक्षा की और ब्रह्मचारी जी को आशीर्वाद् देकर अंतर्धान हो गए ।