अवन्तिपुर : मंदिर या खण्डर वास्तुकला का आकर्षण का केंद्र

अवन्तिपुर : मंदिर या खण्डर वास्तुकला का आकर्षण का केंद्र

अवन्तिपुर जम्मू और कश्मीर का एक का एक प्रमुख पर्यटन स्थल हैं जो इसके सबसे पुराने शिव मंदिरों में से एक हैं ये मंदिर हैं- अवन्तिश्वर और अवन्तिस्वामी। इन दोनों मंदिरों का निर्माण राजा अवन्तिवर्मन द्वारा 9 वीं शताब्दी के दौरान किया गया। शिव – अवन्तिश्वर मंदिर विनाश के देवता शिव का मंदिर है जबकि अवन्तिस्वामी – विष्णु मंदिर संरक्षण के हिंदू देवता विष्णु का है। इन मंदिरों के निर्माण में अपनाई गई वास्तु शैली यूनानी वास्तु शैली के समान है।

जम्मू कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर से करीब 29 किमी की दूरी पर जब राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलते हैं अनंतनाग जिले की ओर तो अवंतिपुर गांव आता है। पहले कभी अवंतिपुरा के नाम से जाना जाता था यह कस्बा जो आज अवंतिपुर कहलाता है और दरिया जेहलम के किनारे बसा हुआ है। अगर इतिहास के झरोखे में झांकें तो मालूम पड़ता है कि अवंतिपुर की स्थापना महाराजा अवंतिवर्मा ने की थी जिन्होंने सन् 854 से लेकर 883 तक राज किया था कश्मीर पर। अवंतिपुर वैसे भी कश्मीर की प्राचीन राजधानियों में से एक गिनी जाती है लेकिन यह सबसे प्रसिद्ध राजधानी मानी जाती रही है।

आज जहां यह प्राचीन मंदिर है वहां पर यह केवल जीर्ण अवस्था में या यूँ कहे कि केवल खण्डर बचा हैं. लेकिन ये खण्डर भी बहुत सुन्दर हैं. कहते है कि शिव– अवन्तिश्वर मंदिर पर एक बार सुलतान सिकंदर ने हमला किया था जिसे बुतशिकन भी कहा जाता था और जिसने इस स्थान पर राज्य भी किया था। इस हमले के कारण इस मंदिर का विनाश हो गया। इसके अलावा इसके निर्माण के लिए इस्तेमाल की गई कच्ची सामग्री समय और प्रकृति के हमले सहन नहीं कर सकी। अंत में ये मंदिर दफन हो गए थे लेकिन बाद में 18 वीं सदी में अंग्रेजों द्वारा खुदाई करके इन्हें बाहर निकाला गया। खुदाई के दौरान ब्रिटिश कुछ मूर्तियाँ अपने साथ ले गए। इस मंदिर की कुछ कलाकृतियाँ श्रीनगर में स्थित श्री प्रताप सिंह संग्रहालय में देखी जा सकती हैं।यद्यपि शिव – अवन्तिश्वर मंदिर और अवन्तिस्वामी – विष्णु मंदिर जीर्ण अवस्था में है, इन मंदिरों में  देवताओं की कुछ मूर्तियाँ  उनके अलग अलग रूपों में,  अभी भी देखी जा सकती है।

वैसे तो ये खण्डर  आठवीं सदी के हैं लेकिन आज भी यह उतने ही आकर्षित करते हैं आने-जाने वालों को जितना कभी पहले किया करते थे क्योंकि आतंकवाद ने इन पर तो कोई प्रभाव नहीं डाला मगर आने जाने वालों की संख्यां तो कम हुई ही, इनकी देखभाल भी अब नहीं हो पा रही है

 मंदिर के भीतर भीतर प्रवेश का रास्ता इसी दीवार के बीच था जिसे एक अन्य दीवार दो भागों में विभक्त करती है। इसकी दीवारों पर किसी प्रकार की कोई कलाकृतियां नहीं उकेरी गई हैं। इसके आले तथा चौखटें पूरी तरह से सादे हैं जिन पर कोई कलाकृति नजर नहीं आती।

बरामदे मंदिर के केंद्र में मौजूद हैं और मंदिर की आधारशिला वाला चबूतरा  करीब दस फुट ऊंचा है तथा 58 वर्ग फुट व्यास का है। इस चबूतरे के प्रत्येक कोने में 16 वर्ग फुट के अलग अलग चबूतरे जुड़े हुए हैं जो अपने आप में अलग अलग मंदिर, छोटे-छोटे रूप में, के खंडहर हैं। प्रत्येक तरफ से चबूतरे के ऊपर चढ़ने का रास्ता है और ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियों का निर्माण किया गया है। ठीक उसी तरह जिस तरह पंडरेथन के मंदिर हैं।

मंदिर के आधार पर जो एकमात्र बाहरी शोभा आज बची हुई है वह मंदिर की कला का नमूना तो है ही साथ ही में बड़े आकार के खम्भे के मस्तक भी हैं जो समकोण होने के साथ-साथ पूरी तरह से सादगी लिए हुए हैं। जबकि एक खम्बा ऊपर भी टंगा है आज भी। बरामदे के पिछले दो कोनों में कुल चार मंदिर किस्म के स्थान दिखते हैं जिनमे से दो छोटे तथा दो बड़े हैं।