जानिये हनुमान जी के चमत्कारी मंदिर के बारे में, जहां जीवित अवस्था में है वीर हनुमान

जानिये हनुमान जी के चमत्कारी मंदिर के बारे में, जहां जीवित अवस्था में है वीर हनुमान

अगर हम हनुमान मंदिर की बात करें लगभग हर हिस्से में मौजूद हैं. लेकिन कानपुर और इटावा के सरहद पर बीहड़ों के बीच में मौजूद हनुमान मंदिर बेहद खास हैं. इस मंदिर में स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा काफी अद्भुत है क्योकि इस प्रतिमा में उनका मुंह खुला हुआ है और कोई भी भक्त जो भी लड्डू या दूध अन्य किसी चीज़ का भोग लगाता है और सीधा भगवान के पेट में चला जाता हैं. इस गुत्थी को पुरातत्व विभाग के शोधकर्ता भी पता नहीं कर सके कि आखिर यह चमत्कार क्या है। पिलुआ हनुमान मंदिर जिले के ही नहीं बल्कि देश भर के लोगों के लिए एक आस्था का प्रमुख केन्द्र है।

पिलुआ हनुमान मंदिर है। लगभग सात सौ वर्ष पुराना यह प्राचीन मंदिर सिद्ध पीठ के रुप में जाना जाता है। पहले हनुमान जी की प्रतिमा पिलुआ के पेड़ के नीचे स्थापित थी लेकिन आज यह मंदिर भव्य रुप ले चुका है और इस समय मंदिर का जीर्णोद्धार भी कराया जा रहा है। रुरा क्षेत्र में पिलुआ के पेड़ अधिक संख्या में होने के कारण यह मंदिर पिलुआ हनुमान मंदिर के नाम से जाना जाता है। आज यह प्राचीन मंदिर देश में ही विश्व में ख्याति पा चुुका है।

भगवान की प्रतिमा स्थापत्य एवं मूर्ति कला की दृष्टि से अत्याधिक विस्मयकारी है। वैसे तो देश भर में हनुमान जी की लेटी हुई प्रतिमाएं कई प्रमुख मंदिरों में है लेकिन इस मूर्ति की विशेषता यह है कि बाल रुप हनुमान जी लेटे हुए है उनका मुखारबिन्द खुला हुआ है। भगवान भक्तों का प्रसाद ग्रहण करते है। माना जाता है कि हनुमान जी की यह प्रतिमा हजारों टन लड्डू का प्रसाद ग्रहण कर चुकी है लेकिन आज तक उनका मुंह नहीं भर सका है। उनके मुखारबिन्द में जल व दूध हमेशा भरा  रहता है और बराबर बुलबुले भी निकलते रहते हैं। इन बुलबुलों के बारे मंदिर के पुजारियों का कहना है हनुमान जी हर समय रामधुन रटते रहते है

मंदिर के और वह बराबर सांस लेते है। महाभारत काल से भी इस मंदिर का इतिहास जुड़ा हुआ है। पुरातत्वविदों  के लिए भगवान की यह प्रतिमा आज भी शोध का विषय है। पुजारियों का कहना है कि इस सिद्ध पीठ पर जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा के साथ आते है हनुमान जी महाराज उनकी सभी मनोकामनाएं पूरा करते हैं। वैसे तो प्रत्येक मंगलवार व शनिवार को यहां पर भक्तों की भीड़ होती है, लेकिन बुढ़वा मंगल पर आस्था का सैलाब सिद्धपीठ पर उमड़ता है।

दक्षिणमुखी बालरूप हनुमान की यह प्रतिमा लगभग 700 वर्ष पुरानी है। प्रतापनेर स्टेट के राजा हुकुमचंद्र तेज प्रताप सिंह को प्राप्त हुई थी। राजा शिकार खेलने के लिए वन में गए थे, रात अधिक होने के कारण वह विश्राम कर रहे थे तभी राजा को हनुमान जी ने स्वप्न दिया कि मैं यहां पर प्रकट हुआ हूं मेरी पूजा व सेवा की व्यवस्था कराई जाए। जब राजा ने आकर देखा तो हनुमान जी की उभरी हुई पत्थर की आकृति प्राप्त हुई। राजा ने पूरे राज्य का दूध एकत्र कर हनुमानजी को पिलाना शुरू किया, लेकिन वह मुंह नहीं भर पाए।बाद में उन्होंने क्षमा याचना की और एक तांबे के लोटे में भरा दूध जैसे ही भगवान को पिलाया तो उनका मुख अपने आप भर गया। राजा प्रतापनेर अपने किले के पास प्रतिमा को स्थापित कराना चाहते थे लेकिन उनके द्वारा जितनी भी खुदाई कराई जाती थी वह समतल हो जाती थी। हनुमानजी ने राजा को फिर स्वप्न दिया कि वह जहां पर विराजमान हैं वहीं पर रहेंगे। इसके बाद राजा प्रतापनेर ने इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया।